आजादी का अमृत महोत्सव मेरा कार्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति-शब्द मेरे मीत डाक्टर महिमा सिंह – NANDED TODAY NEWS
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आजादी का अमृत महोत्सव मेरा कार्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति-शब्द मेरे मीत डाक्टर महिमा सिंह

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आप और हम अत्यन्त सौभाग्यशाली है, क्योंकि हमने भारत भूमि पर जन्म लिया है। भारत की भूमि शस्य श्यामला हैं। भारत की आत्मा गांवों में बसती है। शुरूआत से ही भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है। हमारे सनातन धर्म ने पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश सदा से ही दिया है।

हम प्रतिपल प्रकृति को किसी न किसी रूप में पूजते है यह इसलिए की हमारे पूर्वजो ने पर्यावरण के महत्व को अंगीकार करते हुए प्रत्येक परिप्रेक्ष्य में इसको इंगित किया है। वट सावित्री व्रत, सोमवारी अमावस्या में पीपल का पूजन , आंवला नवमी में आंवले के वृक्ष की पूजा आदि अनेकों उत्सव प्रकृति को समर्पित है।

हमने हठधर्मिता और विवेकहीनता मे इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया।
वेदो में एक वृक्ष सौ पुत्रों के समान बताया गया। इसलिए आप प्रकृति को वक्त रहते जानने का प्रयत्न अवश्य करें ।

पर्यावरण, हमारे आस पास वो आवरण है जो हमारे जीवन का रक्षा कवच हैं। पर्यावरण अनगिनत, उपहार हमे अनवरत प्रदत्त करता रहता है। हम स्वार्थ वश इस ओर ध्यान नही देते ।

मुझे बचपन से पेड़ पौधों का सांनिध्य मिलता रहा। पपीता, अमरुद, आम, नीबू घर के आंगन में हमारे साथी बन मुस्कुराते थे । नयी कोंपलो का आना, फलो के लिए नए‍ फूलो का आना जानकर, देखकर बहुत आनन्द आता था । जब सुबह सुबह कंठ कोकिला कूकती थी सारा भवन आनंद से झूम उठता था और भवन मे प्रसन्नता व्याप्त हो जाती थीं ।

विवाह में आंगन में मंडप गाड़ने की परंपरा प्रकृति के महत्व को ही दर्शाती है परंतु अब वह लुप्त प्राय है घरों में आंगन बचा ही नहीं।

पर्यावरण मेरे परम मित्रों में से एक है। जिंदगी के सफर में जब मैं पतिदेव के तबादले के कारण मुम्बई पहुँची तो मुझे नहीं पता था की मेरे जीवन का एक नया अध्याय शुरू होने वाला था।

महानगरों में पेड़ पौधों को घरों में रखना अत्यन्त ही दुष्कर और असंभव सा कार्य है किंतु नामुकिन बिल्कुल भी नहीं । मेरे बच्चों के विद्यालय की प्रिसिंपल साहिबा श्रीमती आशा नारायणन भी पर्यावरण प्रेमी निकली !

हमने मिलकर कुछ नया करने की ठानी । उसी दौरान बाल “नेचर ट्रेल’ का आयोजन किया गया जो अत्यंत सफल रहा । बच्चो ने 10 तरह की भिन्न -भिन्न चिड़ियों की आवाज सुनी और पौधो को पहचाना |

बात यही नहीं रुकी हमसब साथियों ने मिलकर एक नान प्राफिटबल आर्गनाइजेशन की नींव रखी- “केयर कार नेचर” और लग गए अपने काम पर ।

हमारा पहला उद्देश्य था नो प्लास्टिक जोन ” का लक्ष्य प्राप्त करना और हम 6 माह में सफल हुए बच्चों के साथ मिलकर 15 अगस्त, जन्माष्टमी जैसे अन्य आयोजनों में “फ्लैश मँ।ब की प्रस्तुति पर्यावरण जागरूकता के लिए अनवरत दी |

“मेरा निजी अनुभव है कि, बच्चों को यदि किसी बात के लिए जागरूक किया जाए तो आपका वह कार्य सिद्ध समझिए और हुआ भी यही । द्यालय ‘लोधा वर्ल्ड स्कूल थाने मे हर कक्षा को हमने जाकर पौधा बोना सिखाया

छोटे गमले दिए सबने अपना नाम लिखा जब परीक्षाफल दिया गया तो उन्हें वही पौधा उपहारस्वरुप दिया गया। विलक्षण थे वो पल। अगले वर्ष विद्यालय मे “हम फिर जा पहुँचे नए बच्चों को अपनी बात बताने |

अभी कार्यक्रम शुरू ही हुआ था कि तभी कुछ ऐसा घटित ‘हुआ जो उल्लास कार्ले, सचिन ,डा० महिमा अर्पणा, , सुप्रिया आशानारायणन जी एवं अन्य अध्यापिकाओ की कल्पना से परे था ।

एल के. जी. की बच्ची उठ के बोली ये बीज आपने प्लास्टिक की थैली मे क्यों मगाया इसको मत इस्तेमाल करिए । हम अभिभूत थे हमारी मेहनत रंग लायी थी।

उस विद्यालय के बच्चो से स्थानीय दुकानदार भी डरते थे कि अगर देख लिया कि प्लास्टिक मे समान दिया तो डॉट पड़ेगी । हम सबका साहस बढ़ा और “हमने सत्र के अंत में चार दिवसीय कार्यशाला की नींव रखी ।

उददेश्य था बस्ती में जाकर स्वच्छता अभियान, शिक्षा का स्तर जानना, पर्यावरण के बारे में जागरुक करना । अभियान अत्यन्त सफल रहा । 6 माह बाद जब वापस गए

तो हर घर की छत पर सब्जियों की बेल थी। आसपास सफाई थी तो हमने किया हुआ वादा निभाते हुए वहाँ विद्यालय के लिए पक्का चबूतरा बनवाया , साइकिले और सिलाई मशीन बांटी ।

अक्सर हम चार सदस्य मिलकर घरो में जाकर डिकम्पोस्टिंग करना भी सिखाते थे । जहाँ चाह वहाँ राह थाने स्टेशन पर हरित बेल्ट स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर बनाई अथक प्रयास से जो नियमित देखभाल से रक्षित है । अनेको कार्य हम सब कर रहे हैं ।

समूह भावना आवश्यक हैं ।समरसता के बिना कोई भी आयोजन सफल नही हो सकता। कुछ कार्यक्रम जैसे — हरित पदयात्रा,थाने स्टेशन का हरित करण,मधुमखी संरक्षण कार्यक्रम,गौरैया बचाओ अभियान,

पौधा घर के अंदर हवा शुद्ध, पौधा दो पौधा लो का समय समय पर आयोजन होता रहता है। ” रक्षा बंधन पर फूलो से बनी हुयी राखी पेड़ों को बांधना ” का विशेष आयोजन अत्यंत सफल और सर्वप्रिय रहा |किचन गार्डन, टेरेस गार्डन को अपनाया और अपनाने की अपील की गई जो सफल हुई। इसलिए दिल लगाने से अच्छा है पौधा लगाइए।

पत्ता ही परमात्मा है ,इससे मित्रता करे ।जहाँ भी जगह मिले वहाँ पौधा लगाइए गमला रखिए। छत पर बालकनी में सीढ़ी के नीचे जरूर पौधा लगाएं या गमला रखें। किसी भी शहर की हरित बेल्ट उसकी हरित स्वस्थता और संपन्नता को दर्शाती हैं। पर्यावरण के दोस्त बनकर वृक्षो का रोपण अत्यन्त आवश्यक है।

वर्तमान में मैंने पार्किंग एरिया में पौधे लगाने की मुहिम आरम्भ करी है और
आगे बढ़ा रही हूं।

प्रकृति और पर्यावरण को मित्र बनाइए । प्रकृति भी बोलती है, क्या आपने कभी सुना है?। कभी सुनने की कोशिश करिए और जुड़िये । आइए इस यात्रा मे जुड़िए और जोड़िए ।

यह एक ऐसी यात्रा हैं, जिससे अगर प्यार हो जाए‍ तो यह यात्रा अनवरत जारी रहती है। आइए वैलेंटाइन डे प्रकृति और पर्यावरण के साथ मनाएं और उसी को समर्पित करें। विश्व पर्यावरण दिवस एक दिन नहीं हर रोज का आयोजन हो यही लक्ष्य हो हम सभी का। मैं अत्यंत आभार प्रकट करती हैं उल्लास सर जी,सचिन जी का

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